कजली तीज (सातड़ी तीज)श्रावण मास की तीज को हरियाली तीज का त्यौहार मनाया जाता है। उसी प्रकार से भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तीज को कजरी तीज का त्यौहार मनाया जाता है। इसे "बूढ़ी तीज" भी कहा जाता है। इस दिन महेश्वरी वैश्य गेहूं, जौ, चने और चावल के सत्तू में घी, मेवा डालकर विभिन्न प्रकार के पकवान बनाते है तथा चन्द्रोदय के बाद उसी का भोजन करते हैं। इसलिए इसे "सातुड़ी तीज" अथवा "सतवा तीज" भी कहा जाता है। इस दिन विशेषतौर पर गाय की पूजा करी जाती है।आटे की सात लोइयां बनाकर उन पर घी, गुड़ रखकर गाय को खिलाने के बाद ही भोजन किया जाता है। कुछ लोग इस दिन हरियाली तीज की तरह सिंजारे भजते है। इस दिन बहुएं अपनी सास को चीनी और रुपये का बायना निकालकर देती हैं। यह त्यौहार खासतौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में मनाया जाता है। कजरी की प्रतिद्वन्द्विता भी होती हैं। नावी पर चढ़कर लोग कजरी गीत गाते हैं। ब्रज के मल्हारों की ही तरह मिर्जापुर तथा बनारस का यह प्रमुख वर्षागीत माना जाता है। इस दिन घरों में मिठाई तथा पकवान बनाएं जाते है।झूले भी डाले जाते है। ग्रामीण भाषा में इसे "तीजा" कहा जाता है।