विशेष रूप से वर्ष में दो बार चैत्र व अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होकर नवमी तक होती हैं।देवी दुर्गा के नव (६) स्वरूपों की पूजा होने के कारण 'नवदुर्गा' तथा ६ दिन में पूजा होने से नवरात्र कहा जाता है।चैत्र मास के नवरात्र "वार्षिक नवरात्र" तथा आश्विन मास के नवरात्र "शारदीय नवरात्र" कहलाते है। भगवती दुर्गा का साधक भक्त स्नानादि से शुद्ध होकर, शुद्ध वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को सजाये। मण्डप में श्री दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें। मूर्ति के दायी ओर कलश की स्थापन कर ठीक कलश के सामने मिटी और रेत मिलाकर जौ बो दें। मण्डप के पूर्व कोने में दीपक की स्थापना करे। पूजन में सर्वप्रथम गणेश जी का पूजन करके अन्य देवी देवताओं का पूजन करें। उसके बाद जगदम्बा का पूजन करें।पूजन सामग्री: जल, चन्दन, रोली, कलावा, अक्षत, पुष्प, पुष्पमाला, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, आसन, चौकी, पूजन पात्र, आरती कलशादि।कुमारी-पूजन:आठ या नौ दिन तक इस प्रकार पूजा करने के बाद, महाष्टमी या रामनवमी को पूजा समाप्त करके कुमारी कन्याओं को भोजन कराना चाहिए। कुमारियों की संख्या नौ हो तो अति उत्तम, नहीं तो कम से कम दो होनी चाहिए। कुमारियों की आयु एक से दस वर्ष तक होनी चाहिए। क्रमशः इन सब कुमारियों के नमस्कार मंत्र इस प्रकार हैं: कुमार्यै नमः, त्रिमूर्त्यै नमः, कल्याण्यै नमः, रोहिण्यै नमः, कालिकायै नमः, चण्डिकायै नमः, शाम्भव्यै नमः, दुर्गायै नमः, सुभद्रायै नमः।पूजन करने के बाद, जब कुमारी देवियाँ भोजन कर लें, तो उनसे अपने सिर पर अक्षत छुआएँ और उन्हें दक्षिणा दें। इस प्रकार करने से महामाया भगवती अत्यन्त प्रसन्न होकर मनोरथ पूर्ण करती हैं।